संयुक्त राष्ट्र में सुषमा स्वराज जी की आवाज

दिंनाक: 28 Sep 2016 12:50:33

 

दुनिया के सबसे बड़े मंच यूएन महासभा से भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी ने पूरे विश्व समुदाय के लिए नासूर बन चुके आतंकवाद पर जिस तरह से हल्ला बोला है, वह आने वाले दिनों में अप्रत्याशित परिणाम ला सकता है। विश्व के 193 देशों की महापंचायत में भारत की तरफ से सिर्फ निजी समस्याओं का रोना रोकर, मदद की गुहार लगाने जैसी भूल से बचकर, वैश्विक चिंता प्रकट करके एक बहुत बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि हासिल की है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इसी मंच से पाँच दिन पहले अपना पुराना कश्मीर राग अलापते और भारत पर बेबुनियादी आरोप लगाते हुए ही अपना सारा समय जाया कर दिया। पाकिस्तान के इस तरह के घिसे-पीटे राग को सुन-सुनकर पूरी दुनिया के कान पक चुके हैं। इसलिए, सुषमा स्वराज जी को पाकिस्तान के कान खोलने के लिए उसका सीधे नाम लेना पड़ा और उसे दो टूक शब्दों में चेताना पड़ा कि अगर पाकिस्तान यह समझता है कि वह आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देकर या भड़काऊ बयान देकर भारत का कोई हिस्सा हमसे छीन सकता है, तो उसका यह मंसूबा कभी पूरा नहीं होगा। कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और अभिन्न हिस्सा रहेगा। इसलिए, यह ख्वाब देखना छोड़ दे। यूएन महासभा में पाकिस्तान को इससे खरा और सपाट जवाब और कोई शायद हो नहीं सकता था।

 

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ द्वारा कश्मीर में भारत पर मानवाधिकारों के हनन के आरोप पर ऐसा करारा जवाब दिया, जिसकी शायद ही कल्पना की होगी। सुषमा जी ने इस आरोप पर पलटवार करते हुए बेहद करारा जवाब दिया कि ‘जिनके अपने घर शीशे के हों, उसे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिएं।’ सुषमा जी ने अपने करारे वार को जारी रखा और पाकिस्तान की दुखती रग को दबाते हुए कहा कि जरा एक बार बगल में झांककर देख लें, क्या हो रहा है बलूचिस्तान में? बलूचिस्तान में जो कुछ हो रहा है, वह यातनाओं की पराकाष्ठा है। सुषमा जी ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के उस आरोप की भी डटकर पोल खोल कि आपसी बातचीत के लिए जो शर्तें भारत द्वारा लगाई जा रही हैं, वे शर्तें उन्हें स्वीकार नहीं हैं। सुषमा ने भारत की तरफ से प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में निमंत्रण से लेकर मोदी के काबूल से दिल्ली आने के दौरान लाहौर उतरने जैसी कई ठोस मैत्री पहलों का हवाला देते हुए पाकिस्तान के आरोपों की हवा निकाल दी। उन्होंने पूरी दुनिया को स्पष्ट शब्दों में सच्चाई से अवगत करवाते हुए कहा कि भारत ने शर्तों के आधार पर नहीं, मित्रता के आधार पर पाकिस्तान के साथ सभी विवाद सुलझाने की पहल की थी। मित्रता भी सहजता के साथ जा रही थी। भारत ने पिछले दो वर्षों के दौरान मित्रता का वो पैमाना खड़ा किया, जो उससे पहले कभी नहीं था। उन्होंने सीधे पाकिस्तान पर सवाल दाग दिया कि हम शर्तें लगा रहे हैं या वे दूसरी नीयत दिखा रहे हैं? सुषमा जी ने भारत के पक्ष को प्रबलता के साथ रखते हुए पूरे वैश्विक समुदाय को अपनी विडम्बनाओं से अवगत करवाते हुए सहानुभूति बटोरने में भी कामयाबी हासिल की। सुषमा ने कहा कि मित्रता के नए पैमाने खड़ा करने के बदले उन्हें पठानकोट और उड़ी के  आतंकवादी हमले मिले।

 

सुषमा स्वराज जी  ने पूरी दुनिया के लिए नासूर बन चुके आतंकवाद के रक्त-चरित्र से अवगत करवाते हुए, इससे निपटने की जो राह सुझाई है, वह भारत के कद को ऊँचा करने वाली है। उन्होंने कहा कि विश्व आतंकी ताकतों से लंबे समय से जूझ रहा है। लेकिन, आतंकवाद का शिकार हुए मासूमों के खून पर आंसूओं के बावजूद, इस वर्ष काबुल, ढ़ाका, इंस्ताबुल, बांग्लादेश, ब्रासिल्स, बैंकाक, पेरिस, पठानकोट और उरी में हुए आतंकवादी हमले एवं सीरिया व इराक में रोजमर्रा की बर्बरता हमें यह याद दिलाते हैं कि हम इसे रोकने में सफल नहीं हो रहे हैं। सुषमा जी ने यूएन में दो टूक शब्दों में कहा कि यदि हमें आतंकवाद से लड़ना है तो यहां बैठे हम सब लोगों को यह स्वीकारना होगा कि आतंकवाद मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन है, क्योंकि वह निर्दोष लोगों को निशाना बनता है, बेगुनाहों को मारता है, वह किसी व्यक्ति या देश का अपराधी नहीं, बल्कि मानवता का अपराधी है। उन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कहा कि सबसे पहले हम इस कटू सत्य को स्वीकारें। सुषमा स्वराज जी ने यूएन में अप्रत्यक्ष तौरपर पाकिस्तान को बेनकाब करते हुए पूरे विश्व समुदाय का ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने कहा कि हमें यह देखना होगा कि इन आतंकवादियों को पनाह देने वाले कौन-कौन हैं? आतंकवादियों का न तो अपना कोई बैंक है, न हथियारों की फैक्ट्रियां। इसके बावजूद कहां से उन्हें धन मिलता है? कौन इन्हें हथियार देता है? कौन इन्हें सहारा देता है? कौन इन्हें संरक्षण देता है?

 

सुषमा जी ने वैश्विक मंच से आतंकवाद के पोषक देशों को दो टूक शब्दों में न केवल चेताया, बल्कि पूरे विश्व समुदाय को आतंकवाद से निपटने की राह भी सुझाई। उन्होंने स्पष्ट शब्दों मे कहा कि इतिहास गवाह है, जिस किसी ने भी हिंसक विचारधारा के बीज बोए हैं, उसका कड़वा फल खाने को उसे मिला है। ये छोटे-छोटे आतंकवादी समूह जो छिटपुट काम कर रहे थे, आज इन समूहों ने मिलकर एक राक्षस का रूप धारण कर लिया। इसके अनगिनत हाथ हैं, अनगिनत पांव हैं, अनगिनत दिमाग हैं और साथ में है अति आधुनिक तकनीक। इसलिए, अब अपना या पराया, मेरा या दूसरे का आतंकवादी कहकर हम इस जंग को नहीं जीत पाएंगे। पता नहीं यह दैत्य किस समय किस तरफ का रूख कर लेगा? इसलिए, यदि हम इस आतंकवाद को जड़ से उखाड़ना चाहते हैं तो एक ही तरीका है, हमें आपस के मतभेद भुलाकर आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हों। उसका मुकाबला दृढ़संकल्प से करें और अपने प्रयासों में तेजी लाएं। हमें पुराने समीकरण तोड़ने होंगे। अपनी पसन्दगियां-नापसन्दगियां एक तरफ रखनी होंगी। मोह त्यागने होंगे। अहसानों को भूलना होगा। एक दृढ़निश्चय के साथ इक्ट्ठे होकर इस आतंकवाद का सामना करने की रणनीति बनानी होगी। ये मुश्किल काम नहीं है, केवल इच्छा शक्ति की कमी है। ये काम हो सकता है और यह काम हमें करना है। यदि यह नहीं करेंगे तो हमारी आने वाली संततियां कभी माफ नहीं करेंगीं।

 

सुषमा स्वराज जी ने यूएन में पाकिस्तान को विश्व में आतंकवाद के मुद्दे पर अलग-थलग करने का अप्रत्यक्ष आह्वान करते हुए जबरदस्त कूटनीति का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि यदि आतंकवाद के खात्मे की इस रणनीति में कोई देश शामिल नहीं होना चाहता तो हमारी मांग है कि हम उसे अलग-थलग कर दें, क्योंकि दुनिया में ऐसे देश हैं जो बोते भी हैं तो आतंकवाद, उगाते भी हैं तो आतंकवाद, बेचते हैं तो आतंकवाद और निर्यात भी करते हैं तो आतंकवाद। आतंकवादियों को पालना कुछ देशों का शौक बन गया है। सुषमा जी की इन दलीलों व दावों का यूएन महासभा में बैठे 193 देशों के प्रतिनिधियों ने तालियां बजाकर अपना समर्थन व्यक्त किया। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच सुषमा स्वराज ने वैश्विक समुदाय से अपील करते हुए कहा कि आतंकवाद पालने वाले शौकिन देशों की पहचान करके उनकीं जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए और ऐसे देशों को भी चिन्हित करना चाहिए, जहां संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकवादी सरेआम जलसे कर रहे हैं, प्रदर्शन करते हैं, जहर उगलते हैं और उनके ऊपर कोई कार्यवाही नहीं होती है। इसके लिए आतंकवादियों के साथ वे देश भी दोषी हैं, जो उन्हें ऐसा करने देते हैं। सुषमा स्वराज जी ने दो टूक शब्दों में कहा कि ऐसे देशों की विश्व समुदाय में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। इस मांग पर तालियों की गड़गड़ाहट यूएन की स्वीकृति का स्पष्ट संकेत समझा जा सकता है।

 

कुल मिलाकर, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी ने संयुक्त राष्ट्र में बेहद सूझबूझ से न केवल आतंकवाद के मसले पर भारत की चिंताओं एवं चुनौतियों से पूरी दुनिया को अवगत करवाया, बल्कि आतंकवाद को पोषित करने वाले देशों को अलग-थलग करने की मांग पर भी वैश्विक समर्थन जुटाया। इसके साथ ही पूरे विश्व का नासूर बन चुके आतंकवाद के खिलाफ विश्वव्यापी एकजुटता और स्पष्ट संकल्पबद्धता का आह्वान आतंकवाद के खिलाफ कारगर रणनीति की नींव बनने वाला है। भारत द्वारा वर्ष 1996 से दिए जा रहे सीसीआईटी यानी ‘कन्प्रहैन्सिव कन्वैन्सनल ऑन इन्टरनैशनल टेरेरिजम’ के प्रस्ताव को 20 साल बाद भी अंजाम तक न पहुंचाने की भूल का अहसास भी यूएन में करवाया गया और आतंकवाद व आतंकवादियों पर नकेल कसने के लिए इस प्रस्ताव को जल्द पारित करने की मांग दोहराई गई। इसी के साथ स्पष्ट तौरपर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में विस्तार की पुनः पैरवी करते हुए, उसमें भारत की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग भी जोरदार तरीके से रखी गई। यूएन में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी का भाषण पूरे वैश्विक समुदाय को आतंकवाद से निपटने के लिए एक नई राह दिखाने वाला कहा जा सकता है।