भोजन की बर्बादी रोकने की अपील।

दिंनाक: 30 Mar 2017 15:38:59

हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी देश की जनता से ‘मन की बात’ करते हुए सामाजिक, पारिवारिक एवं व्यक्तिगत मुद्दों को उठाते हैं। इसी श्रृंखला की ताजा कड़ी में देशवासियों को भोजन की बर्बादी के प्रति आगाह किया। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए यह पाठ पढ़ना जरूरी है। क्योंकि एक तरफ विवाह-शादियों, पर्व-त्यौहारों एवं पारिवारिक आयोजनों में भोजन की बर्बादी बढ़ती जा रही है, तो दूसरी ओर भूखें लोगों के द्वारा भोजन की लूटपाट देखने को मिल रही है। भोजन की लूटपाट जहां मानवीय त्रासदी है, वही भोजन की बर्बादी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। एक तरफ करोड़ों लोग दाने-दाने को मोहताज हैं, कुपोषण के शिकार हैं, वहीं रोज लाखों टन भोजन की बर्बादी एक विडम्बना है। एक आदर्श समाज रचना की प्रथम आवश्यकता है अमीरी-गरीबी के बीच का फासला खत्म हो।
शादियों, उत्सवों या त्योहारों में होने वाली भोजन की बर्बादी से हम सब अवगत हैं। इन अवसरों पर ढेर सारा खाना कचरे में चला जाता है। होटलों में भी हम देखते हैं कि काफी मात्रा में भोजन जूठन के रूप में छोड़ा जाता है। एक-एक शादी में 45-65 तरह के व्यंजन परोसे जाते हैं, खाने वाले व्यक्ति के पेट की एक सीमा होती है, लेकिन हर तरह के नये-नये पकवान एवं व्यंजन चख लेने की चाह में खाने की बर्बादी ही देखने को मिलती हैं, इस भोजन की बर्बादी के लिये न केवल सरकार बल्कि सामाजिक संगठन भी चिंतित है।

भारतीय संस्कृति में जूठन छोड़ना पाप माना गया है। दूसरी ओर यहां तो अन्न को देवता का दर्जा प्राप्त है। दुनियाभर में हर वर्ष जितना भोजन तैयार होता है उसका एक तिहाई भोजन बर्बाद चला जाता है। बर्बाद जाने वाला भोजन इतना होता है कि उससे दो अरब लोगों की खाने की जरूरत पूरी हो सकती है। विश्व भर में होने वाली भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन, अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष और विश्व खाद्य कार्यक्रम ने एकजुट होकर एक परियोजना शुरू की है।

समस्या की शक्ल लेती यह स्थिति चिन्ताजनक है और प्रधानमंत्री इसके लिये जागरूक है, यह एक शुभ संकेत है। हम सब व्यक्तिगत तथा सामाजिक तौर पर भोजन की बर्बादी को रोककर कई लोगों का पेट भर सकते हैं। विश्व खाद्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया का हर सातवां व्यक्ति भूखा सोता है। विश्व भूख सूचकांक में भारत का 67वां स्थान है। देश में हर साल 25.1 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन होता है लेकिन हर चैथा भारतीय भूखा सोता है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल और 21 करोड़ टन सब्जियां वितरण प्रणाली में खामियों के कारण खराब हो जाती हैं। विश्व खाद्य संगठन के मुताबिक भारत में हर साल पचास हजार करोड़ रुपए का भोजन बर्बाद चला जाता है, जो कि देश के खाद्य उत्पादन का चालीस फीसद है। इस अपव्यय का दुष्प्रभाव हमारे देश के प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ रहा है। हमारा देश पानी की कमी से जूझ रहा है लेकिन अपव्यय किए जाने वाले इस भोजन को पैदा करने में इतना पानी व्यर्थ चला जाता है जिससे दस करोड़ लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है। होटल-रेस्तरां के साथ ही शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में सैकड़ों टन भोजन बर्बाद हो रहा है। औसतन हर भारतीय एक साल में छह से ग्यारह किलो अन्न बर्बाद करता है। जितना अन्न हम एक साल में बर्बाद करते हैं, उसकी कीमत से ही कई सौ कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं जो फल-सब्जी-अनाज को सड़ने से बचा सकते हैं। इसलिये सरकार को चाहिए कि वह इन विषयों को गंभीरता से ले, नयी योजनाओं को आकार दे, लोगों की सोच को बदले, तभी नया भारत का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा।

हम सब का भोजन की बर्बादी को रोकने में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। हमे शादियों तथा अन्य आयोजनों में मेहमानों की संख्या के साथ ही परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या सीमित करने पर विचार करना चाहिए। दिखावा, प्रदर्शन और फिजूलखर्च पर प्रतिबंध की दृष्टि से विवाह समारोह अधिनियम, 2006 हमारे यहां बना हुआ है, इसे सख्ती से लागू करने की जरूरत है। धर्मगुरुओं व स्वयंसेवी संगठनों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए। घर की महिलाएं इसमें सहयोगी हो सकती है। खासकर वे बच्चों में शुरू से यह आदत डाले कि उतना ही थाली में परोसें, जितनी भूख हो। इस बदलाव की प्रक्रिया में धर्म, दर्शन, विचार एवं परम्परा का भी योगदान एक नये परिवेश को निर्मित कर सकता है।