सिक्खों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी को बलिदान दिवस पर शत शत नमन।

दिंनाक: 07 Oct 2016 10:12:56


जो भगीरथ कार्य श्रीगुरुगोबिंद सिंहजी ने अपने जीवन काल में किए उसकी आवश्यकता आज भी समाज को बहुत भारी मात्रा में है। जो सामाजिक समरसता का संदेश उन्होंने दिया उस पर चल कर पूरे समाज को समरस करने का प्रयास आज भी किया जाना चाहिए। अन्याय एवं अधर्म के खिलाफ लड़ने के लिए खालसा (संत सिपाही) का सिद्धांत भी उनकी ही देन है।

भारत के इतिहास में कुछ ऐसे युगपुरुष हुए जिनका योगदान यदि न होता तो आज इतिहास ही शायद कुछ और होता। श्रीगुरुगोबिंदसिंह जी एक ऐसे संत सिपाही और सर्वंशदानी महापुरूष हुए जिनके बारे में एक कवि ने कहा है, ‘न कहूं अब की न कहूं तब की, अगर न होते गुरुगोबिंद सिंह तो सुन्नत होती सबकी।’
श्री गुरुगोबिंद सिंह जी का जन्म २२ दिसम्बर १६६६ को पटना साहिब में सिख पंथ के नौवें गुरु श्री गुरुतेगबहादुर जी के घर में हुआ। चार साल तक अपना बचपन पटना साहिब में गुजार कर वे अपने पिता श्री गुरुतेगबहादुर जी के साथ पंजाब में आनंदपुर साहिब नामक स्थान पर लौट आए। श्री गुरुतेगबहादुर जी ने अपने सुपुत्र को हर प्रकार की शिक्षा दीक्षा से परिपूर्ण करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

जब श्री गुरुगोबिंद सिंह जी लगभग नौ बरस के हुए तो एक ऐसी घटना घटी जिसने भारत के इतिहास में एक बहुत बड़ा मोड़ लाने का काम किया। उस समय मुगल शासक औरंगजेब का जिहादी उन्माद अपनी चरम सीमा पर था। हिंदुओं का बलात धर्म परिवर्तन करने का निर्देश उसने अपने अधीन सभी मुस्लमान नवाबों को दे रखा था। आतंक का एक भयानक वातावरण पूरे हिंदुस्तान में व्याप्त था। ऐसे में कश्मीर में औरंगजेब के अधीन एक नवाब इफ्तिखार खान ने पूरी हिन्दू जनसंख्या को मुसलमान बनाने का प्रण कर रखा था। एक हिंदू कश्मीरी पंडित कृपा रामजी अपने कुछ साथियों के साथ आनंदपुर साहिब में गुरुतेगबहादुर जी की शरण में आए और उन्हें आकर बताया कि हम कुछ हिन्दू परिवार कश्मीर में शेष रह गए हैं और इफ्तिखार खान के अत्याचार का शिकार हो रहे हैं। आप कृपया हमारा मार्गदर्शन कीजिए और हिन्दू धर्म के कुछ अनुयायी जो कश्मीर में बाकी बचे हैं उन्हें जिहादियों के अत्याचार से बचाइए।

उनकी इस प्रकार की वेदना को सुनकर श्री गुरुतेगबहादुर कुछ क्षणों के लिए अन्तर्ध्यान हो गए और ध्यान से बाहर आने के बाद उनके मुंह से यह वाक्य निकला, मुझे लगता है हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अभी किसी महापुरुष के बलिदान की आवश्यकता है। गुरु गोबिंदसिंहजी जो उस समय केवल नौ वर्ष के थे और वही पर खड़े थे उन्होंने तत्काल अपने पिता को संबोधित करते हुए कहा, पिताजी यदि धर्म रक्षा के लिए किसी महापुरुष के बलिदान की आवश्यकता है तो आपसे बड़ा महापुरुष इस समय और कौन हो सकता है। अपने पुत्र के मुख से यह वाक्य सुनकर श्री गुरुतेगबहादुरजी ने पंडित कृपा राम से कहा, आप इफ्तिखार खान को जाकर कह दीजिए कि हिंदुओं का गुरुतेगबहादुर यदि इस्लाम स्वीकार करता है, तो हम भी इस्लाम स्वीकार करने को तैयार हैं। जब यह सन्देश इफ्तिखार खान के माध्यम से औरंगजेब तक पहुंचा तो उसने क्रुद्ध होकर गुरुतेगबहादुरजी को बंदी बनाने का आदेश दे दिया।

श्री गुरुतेगबहादुरजी को उनके तीन शिष्यों भाई मतिदास, भाई सतीदास, भाईदयालाजी के साथ गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया और उनको आदेश दिया गया के यदि वे यातनाओं से और मृत्युदंड से बचना चाहें तो इस्लाम स्वीकार कर लें। परंतु धर्मवीर गुरुतेगबहादुरजी और उनके शिष्यों ने जिहादियों का फरमान न मानते हुए और अनेक यातनाओं को सहते हुए अपने धर्म की रक्षा की और औरंगजेब के जल्लादों ने उनके प्राण ले लिए।

इस घटना ने पूरे समाज में एक विचित्र प्रकार की जाग्रति का निर्माण किया और पूरे भारत में जो धर्मान्तरण का कुचक्र औरंगजब ने चला रखा था। उसके विरोध में पूरा समाज कमर कसकर तैयार खड़ा हो गया और जिहादियों का यह स्वप्न कि पूरे भारत का इस्लामीकरण हो, अधूरा रह गया। अपने पिता के प्राणों का बलिदान देखने के बाद श्री गुरुगोबिंद सिंह जी ने यह प्रण किया के सुप्तप्राय समाज में नव जागृति का संचार करने के लिए कुछ नए उपाय करने होंगे। उस समय उनके कहे एक वाक्य का उल्लेख होता है, चिड़ियों से में बाज लड़ा उतभै गोबिंदसिंह नाम धराऊं। और वास्तव में जो समाज चिड़ियों की तरह भयभीत था उसको मुगल शासन की ईंट से ईंट बजाने के लिए खड़ा कर दिया। श्रीगुरुगोबिंदसिंह जी ने समाज को संगठित कर, स्थान स्थान पर मुगलों से युद्ध किए और उनके सेनापतियों को पराजित किया। सन १६९९ के बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में उन्होंने सिखों का एक बहुत भारी एकत्रीकरण किया और खालसा पंथ की स्थापना की। उस एकत्रीकरण में उन्होंने पंजप्यारे सज्जित करके, उनको अमृत चखा कर, फिर उनसे स्वयं अमृत चख कर, सिख पंथ के संत सिपाही बनाने की परंपरा शुरू की। यह पंजप्यारे जिनका नाम भाई दयासिंह, भाई धर्मसिंह, भाई मोहकमसिंह, भाई हिम्मतसिंह और भाई साहिबसिंह थे। अलग-अलग जातियों से आते थे और भौगोलिक दृष्टि से सम्पूर्ण भारत भर के क्षेत्रों जैसे लाहौर, हस्तिनापुर, द्वारिका, जगन्नाथपुरी और बीदर से संबंध रखते थे। संपूर्ण भारत को राष्ट्रीय दृष्टि से एक करने का प्रमाण उस समय के इतिहास में इससे बड़ा कही नहीं मिलता। दूसरा जो हिन्दू समाज उस समय विभिन्न जातियों में बंटा था। उसको भी एक करने का प्रयास इस से बड़ा कहीं नहीं दीखता।

उस समय, जैसी कि हमें जानकारी है, केवल क्षत्रिय समाज ही युद्ध किया करता था और अधिकांश कर राजपूतों के नामके साथ ही सिंह शब्द लगता था। उसका तात्पर्य यह होता था कि संकट के समय केवल समाज का एक चौथाई हिस्सा ही रक्षण करने के लिए आगे आता था। गुरुगोबिंदसिंह जी ने एक ऐसा क्रान्तिकारी कार्य किया की पूरे समाज को जो खालसा पंथ के साथ जुड़ा उसके नाम के साथ सिंह शब्द लगा दिया। अर्थात सिंह के गुण पूरे समाज में व्याप्त कर दिए और अत्याचारों के विरोध में उसको खड़ा कर दिया। इसमें एक बात जानना बहुत महत्वपूर्ण है कि उन्होंने केवल युद्ध करने वाले सिपाही का निर्माण नहीं किया, बल्कि वे अपने मानव धर्म से अलग न हो सके, उसमें संत के गुणों का भी समावेश किया। वास्तव में उन्होंने समाज में संत सिपाही निर्माण करने करने का अद्वितीय प्रयास किया। मुग़लों के अत्याचार बढ़ने लगे और उन्होंने गुरुगोबिंदसिंह जी और उनके सिक्ख अनुयायियों को समाप्त करने की ठान ली। चमकौर नामक स्थान पर गुरूजी के साथ मुग़लों का भीषण युद्ध हुआ उसमें उनके दो बड़े साहिब जादे अजीत सिंह एवं जुझार सिंह पराक्रम से लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए। उनके दो छोटे पुत्र जो रावर सिंह और फतह सिंह, जिनकी आयु मात्र नौ वर्ष और छह वर्ष थी, को सरहिंद के नवाबवज़ीर खान ने इस्लाम स्वीकार न करने के लिए जिन्दा दीवार में चुनवा दिया। ऐसा कहा जाता है कि उस समय श्रीगुरुगोबिंद सिंह अपने सिखों की एक सभा को संबोधित कर रहे थे। जब छोटे साहिबजादों के बलिदान का समाचार उनको दिया गया तब अपने सिखों की तरफ देख कर उनके मुख से यह वाक्य निकला, इन पुत्र न केशीश पर वार दिए सुतचार, चार मुए तो क्या हुआ जीवित कई हजार।

श्रीगुरुगोबिंद सिंह जी ने औरंगजेब के अत्याचारों का विरोध करते हुए उसे एक फारसी में पत्र लिखा जिसे जफरनामा के नाम से जाना जाता है। उसमें उन्होंने यह लिखा था-
चूंकर अजहमाहीलतेदरगुजश्त
हलाल अस्तबुरदनबशमशीरदस्त।

इसका मतलब होता है कि अत्याचार को समाप्त करने के सभी शांतिप्रिय रास्ते जब बंद हो जाते हैं तो हाथ में शस्त्र लेना न्यायपूर्ण हो जाता है। श्रीगुरुगोबिंद सिंह गोदावरी नदी के किनारे नांदेड नामक स्थान पर अपने सिखों के साथ में पहुंचे और श्रीगुरुग्रंथसाहेब को अपने बाद में गुरुगद्दी देने की घोषणा की और कहा कि मेरे बाद अब देहधारी गुरुओं की परंपरा समाप्त हो गई। उस समय कहे गए उनक ेवाक्य का उल्लेख इस प्रकार आता है, आज्ञा भयी अकाल की तभैचलायो पंथ, सब सिक्खन को हुकुम है गुरुमान्यो ग्रन्थ। सरहिंद के अत्याचारी जिहादी नवाब वज़ी खान के मन में गुरूजी के लिए शत्रुता कूटकूट कर भरी हुई थी। उसने अपने कुछ पठान सैनिकों को उनके पीछे नांदेड में भेज कर उन पर धोखे से आक्रमण करवाया और उस आक्रमण के द्वारा लगे घाव के कारण ७ अक्टूबर १७०८ को गुरूजी अकाल पुरुख में विलीन हो गए। जो भगीरथ कार्य श्रीगुरुगोबिंद सिंहजी ने अपने जीवन काल में किए उसकी आवश्यकता आज भी समाज को बहुत भारी मात्रा में है। जो सामाजिक समरसता का संदेश उन्होंने दिया उस सन्देश पर चल कर पूरे समाज को समरस करने का प्रयास आज भी किया जाना चाहिए। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण शक्ति राष्ट्र रक्षा के लिए लगाई, जिसे हमें आज कदापि भूलना नहीं चाहिए। जिस प्रकार से जिहादी मानसिकता को समाप्त करने के लिए समाज का संगठन श्रीगुरुगोबिंद सिंह जी ने किया उसकी आवश्यकता आज भी समाज को है और एक बात पूरी मानव जाति को श्रीगुरुगोबिंद सिंह जी के जीवन से सीखनी चाहिए कि अत्याचारी हिंसा का जवाब प्रतिक्रिया के रूप में हिंसा से ही होगा परंतु जो मानव के दया और धर्म के गुण हैं, वे हिंसा का जवाब देते समय समाप्त नहीं होने चाहिए।

गुरु गोबिन्द सिंह जी ने धर्म, संस्कृति व राष्ट्र की आन-बान और शान के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया था।
वास्तव में संत सिपाही के सिद्धांत का प्रतिपादन जो श्रीगुरुगोबिंद सिंह जी ने किया, उस पर चलने की आवश्यकता आज पूरे समाज एवं राष्ट्र को है।
सिक्खों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी को बलिदान दिवस पर शत शत नमन।

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