भविष्य में भारत बन सकती है दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था: फार्च्यून मैगजीन

दिंनाक: 06 May 2016 13:57:58


प्रधानमंत्री मोदी की नीतियो की बदौलत ही देश की अर्थव्यवस्था में नयी जान आई है, जिसकी सराहना अब संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक सामाजिक आयोग (यूएनएस्केप) के बाद दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित फार्च्यून मैग्जीन ने की है। मैग्जीन ने दावा किया किया है की भारतीय अर्थव्यवस्था के आनेवाले समय में और अधिक मजबूत होगी। गौरतलब हो की गत अप्रैल महीने में यूएनएस्केप ने कहा था की भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2016-17 में 7.6 प्रतिशत हो सकती है।
फार्च्यून मैगजीन ने अपने लेख में भारत की अर्थव्यवस्था को आने वाले समय की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाला देश बताया है। इसकी बड़ी वजह है चीन की युवा आबादी का धीरे-धीरे कम होना। चीन में एक ही बच्चा पैदा करने की नीति है जिसके चलते चीन में व्यापार की रफ्तार धीमी हो रही है। जबकि भारत में युवा आबादी देश की अर्थव्यवस्था को नयी उंचाइयों पर ले जा रही है। अर्नस्ट एंड यंग के अनुसार भारत की कार्य क्षमता 2020 तक 900 मिलियन हो जाएगी।

वहीं इस मायने में अमेरिका तीसरी सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरेगा जिसके पास 160 मिलियन कार्यक्षमता है। किसी भी अर्थव्यवस्था की श्रमिक सबसे बड़े स्ंतंभ होते हैं, ऐसे में भारत के युवाओं की तकनीकी क्षमता में विकास अर्थव्यवस्था के लिए वरदान साबित हो सकता है।


ताजा रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी निवेश (एफडीआई) को आकर्षित करने के मामले में भारत ने चीन के साथ अमेरिका को भी पीछे छो़ड़ दिया है। भारत ने 63 बिलियन डॉलर के एफडीआई प्रॉजेक्ट्स को 2015 में आकर्षित किया। इसके साथ ही 697 प्रॉजेक्ट्स में 8 पर्सेंट की बढ़ोतरी हुई है। 2015 में बड़ी कंपनियों में फॉक्सकॉन, सनएडिशन ने पांच और चार बिलियन डॉलर के प्रॉजेक्टस में इन्वेस्टमेंट करने की बात कही है।

एक साल में कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस और अक्षय ऊर्जा सेक्टर्स में बड़े प्रॉजेक्टस की घोषणा की गई। रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में भारत पहली बार एफडीआई के मामलें में शिखर पर पहुंचा। भारत ने चीन के साथ अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया। अमेरिका ने 2015 में 59.6 बिलियन डॉलर और चीन ने 56.6 बिलियन डॉलर एफडीआई आकर्षित किए।

मौजूदा समय में भारत के सिर्फ 2 फीसदी लोगों के पास आधिकारिक स्किल की ट्रेनिंग है। जबकि यूके में यह 68 फीसदी और जर्मनी में 75 फीसदी और साउथ कोरिया में यह 96 फीसदी है। रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड के सर्वे के अनुसार 2010 में भारत को 40 लाख सिविल इंजीनियर की जरूरत थी जबकि सिर्फ 509000 ही उपलब्ध थे। लेकिन 2020 तक भारत के पास सिर्फ 778000 सिविल इंजीनियर होंगे, जबकि जरूरत 4.6 मिलियन की होगी।

वहीं भारत में ऑर्किटेक्ट्स की जरूरत पर नजर डालें तो 2020 तक भारत को 427000 आर्किटेक्ट की जरूरत होगी जबकि सिर्फ 17 फीसदी ही उपलब्ध होंगे। ऐसे में अगर भारत अपने मानव संसाधन का सही इस्तेमाल करता है और बेहतर श्रमकिों को तैयार कर सकता है तो भारत बहुत तेजी से चीन से आगे निकल जाएगा।

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